(कोरबा-बांकी मोंगरा) औद्योगिक नगरी के बांकी मोंगरा क्षेत्र में हुए भीषण गैंगवार और जानलेवा हमले के मामले में स्थानीय पुलिस की कार्यप्रणाली अब कटघरे में आ खड़ी हुई है। वारदात की गंभीरता और मौके से दो आरोपियों के दबोचे जाने के बावजूद पुलिस की रहस्यमयी चुप्पी, जांच में सुस्त रवैये ने कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दो दिन बीत जाने के बाद भी मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारी न होना पुलिस की कार्यशैली पर सवालिया निशान है ।
सुराग हाथ में, फिर भी एक्शन मोड से नदारद क्यों रही पुलिस?
इतने बड़े गैंगवार की सूचना मिलते ही और प्रार्थी पक्ष द्वारा घटना की रात ही दो हमलावरों (रौनक सिंह राजपूत व एक नाबालिग) को पकड़कर पुलिस के सुपुर्द किए जाने के तुरंत बाद पुलिस हरकत में क्यों नहीं आ पाई ? पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गए युवकों से उसी वक्त कड़ाई से पूछताछ कर पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश करना चाहिए था। यदि घटना के तुरंत बाद फौरी तौर पर तेज कार्रवाई की जाती, तो अब तक पुलिस की गिरफ्त में गैंग के कई शातिर युवक आ चुके होते। परंतु पुलिस की इस शिथिलता ने अपराधियों को संभलने का पूरा मौका मिल गया।
रात में ही छापेमारी और घेराबंदी रोकने के पीछे किसका हाथ?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि पकड़े गए आरोपियों की निशानदेही पर उसी रात अन्य हमलावरों की धरपकड़ के लिए ताबड़तोड़ छापेमारी और इलाके की नाकेबंदी क्यों नहीं की गई? चर्चाओं का बाजार गर्म है कि आधी रात को इस धरपकड़ की कार्रवाई को रोकने के पीछे किसी ताकतवर रसूखदार का हाथ है। सूत्रों के मुताबिक, गैंगवार में शामिल युवकों में एक पुलिसकर्मी के बेटे की संलिप्तता की अपुष्ट खबरें भी सामने आ रही हैं। हालांकि अभी इसकी कोई अधिकारिक पुष्टि नहीं हो पायी है। परन्तु ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अपनों को या रसूखदारों को बचाने के चक्कर में पुलिस ने खुद अपने हाथ बांध लिए?
14-15 हमलावरों के नाम सामने, फिर FIR में सिर्फ दो पर क्यों?
प्रार्थी कुणाल आजाद और चश्मदीदों के बयानों में जहां 14 से 15 हमलावरों की सक्रिय भागीदारी और मुख्य सरगना के रूप में राहुल यादव (निवासी चुनचुनी कॉलोनी) समेत विक्रम यादव उर्फ बम व अन्य के नाम खुलकर सामने आए हैं, वहीं पुलिसिया FIR में रौनक़ सिंह राजपूत के अलावे सिर्फ इन्ही दो युवकों के नाम क्यों दर्ज किए गए? बाकी नामजद और संलिप्त आरोपियों को प्राथमिकी से बाहर क्यों रखा गया है?
दो दिन बीते, हाथ खाली: फरार होकर अंडरग्राउंड हुए आरोपी
घटनास्थल पर छोड़ी गई मोटरसाइकिलें, सीसीटीवी फुटेज और पकड़े गए युवकों के रूप में पर्याप्त साक्ष्य मौजूद होने के बावजूद दो दिन बीत जाने पर भी पुलिस के हाथ पूरी तरह खाली हैं। पुलिस की इसी 'कछुआ चाल' का नतीजा है कि वारदात में शामिल अधिकांश युवक न केवल क्षेत्र से फरार हो चुके हैं, बल्कि सुरक्षित ठिकानों पर अंडरग्राउंड होने में भी कामयाब रहे। पुलिस की देरी अब सीधे तौर पर आरोपियों के लिए ढाल साबित हो रही है।
सीधे और तीखे सवाल बांकी मोंगरा पुलिस से
जब मौके से दो हमलावर तुरंत पकड़ लिए गए थे, तो त्वरित दबिश देकर अन्य साथियों को उसी रात क्यों नहीं पकड़ा गया?
क्या प्रभावशाली चेहरों के नाम आने के कारण पूरी जांच की प्रक्रिया को जानबूझकर धीमा किया जा रहा है?
घटनास्थल से बरामद लावारिस वाहनों के मालिकों और कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDR) के आधार पर अब तक धरपकड़ क्यों नहीं हो सकी?
कुछ महीने पहले नगर की बिगड़ती कानून व्यवस्था के लिए कांग्रेस ने बांकी थाने में कड़ा विरोध प्रदर्शन किया था जिस पर जनप्रतिनिधियों को बांकी मोंगरा पुलिस के द्वारा मुक़्क़मल सुरक्षित वातावरण बनाने के लिए आश्वासन दिया था।
बहरहाल क्षेत्र में लगातार बिगड़ती कानून-व्यवस्था और पुलिस की कार्यशैली से आम जनता में आक्रोश है।
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