दिब्येन्दु मृधा सह-संपादक छत्तीसगढ़ इफेक्टिव इंडिया

(कोरबा)शिक्षा किसी भी बच्चे के उज्ज्वल भविष्य की नींव होती है। स्कूल बच्चों को केवल पढ़ना-लिखना ही नहीं सिखाता, बल्कि उन्हें जीवन में आगे बढ़ने, अपने अधिकारों को समझने और समाज में सम्मान के साथ जीने का अवसर भी प्रदान करता है। इसी उद्देश्य से शासन-प्रशासन द्वारा बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए अनेक योजनाएं संचालित की जा रही हैं। सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए सुबह नाश्ते और दोपहर के भोजन की व्यवस्था भी की जा रही है, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे भूखे पेट स्कूल न आएं और नियमित रूप से पढ़ाई कर सकें। इसके बावजूद एक गंभीर सवाल हमारे सामने खड़ा है कि आखिर वे बच्चे स्कूल क्यों नहीं पहुंच रहे हैं, जिन्हें शिक्षा के साथ भोजन जैसी बुनियादी सुविधा भी उपलब्ध कराई जा रही है? शाला त्यागी और स्कूल से दूर होते बच्चों की समस्या को समझने के लिए केवल योजनाओं की उपलब्धता देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन परिस्थितियों को भी समझना होगा, जो बच्चों को शिक्षा से दूर कर रही हैं।

गरीबी और पारिवारिक मजबूरियां बन रही हैं शिक्षा की राह में बाधा

शाला त्यागी बच्चों के स्कूल नहीं आने के पीछे कई कारण हो सकते हैं, लेकिन गरीब और मजदूर परिवारों की परिस्थितियां इस समस्या का एक महत्वपूर्ण पहलू हैं। ऐसे अनेक परिवार हैं, जहां माता-पिता सुबह होते ही रोजी-रोटी की तलाश में घर से निकल जाते हैं। किसी के माता-पिता निर्माण कार्य में मजदूरी करते हैं, तो कोई खेतों, कारखानों, दुकानों या अन्य स्थानों पर काम करने जाता है। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी होती है कि दिनभर मेहनत करने के बाद ही घर में चूल्हा जल पाता है।


इन परिवारों में छोटे बच्चों की देखभाल करने वाला कोई दूसरा व्यक्ति उपलब्ध नहीं होता। ऐसे में बड़ी उम्र के बच्चों के कंधों पर छोटी उम्र में ही जिम्मेदारियों का बोझ आ जाता है। वे अपने छोटे भाई-बहनों को संभालते हैं, उन्हें खाना खिलाते हैं, घर की देखभाल करते हैं और कभी-कभी घरेलू कामकाज में भी हाथ बंटाते हैं। माता-पिता की अनुपस्थिति में घर संभालने की जिम्मेदारी उन्हीं पर आ जाती है।


नतीजा यह होता है कि स्कूल जाने की उम्र में बच्चे घर पर रुकने लगते हैं। शुरुआत में वे एक-दो दिन स्कूल नहीं जाते, फिर उनकी अनुपस्थिति बढ़ती जाती है। धीरे-धीरे पढ़ाई छूटने लगती है और अंततः वे शिक्षा की मुख्यधारा से बाहर हो जाते हैं। यह स्थिति केवल किसी एक परिवार की समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों से जुड़ी चुनौती है।

भोजन की व्यवस्था जरूरी, लेकिन समस्या का पूरा समाधान नहीं

सरकारी स्कूलों में सुबह का नाश्ता और दोपहर का भोजन उपलब्ध कराने का उद्देश्य बच्चों को पोषण देना, उनकी उपस्थिति बढ़ाना और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को राहत पहुंचाना है। यह एक महत्वपूर्ण पहल है, क्योंकि कई गरीब परिवारों के लिए बच्चों को पर्याप्त और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना भी चुनौतीपूर्ण होता है।


लेकिन हमें यह समझना होगा कि भोजन की सुविधा तभी प्रभावी होगी, जब बच्चा स्कूल तक पहुंचेगा। यदि बच्चा घर में छोटे भाई-बहनों की देखभाल कर रहा है, माता-पिता मजदूरी पर गए हैं और घर में उसे संभालने वाला कोई नहीं है, तो केवल नाश्ते और दोपहर के भोजन की व्यवस्था उसे नियमित रूप से स्कूल भेजने के लिए पर्याप्त नहीं होगी।


यहां शासन-प्रशासन, शिक्षा विभाग, शिक्षकों, पंचायतों और समाज की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। बच्चों की अनुपस्थिति को केवल उनकी या उनके माता-पिता की लापरवाही मानकर नहीं देखा जाना चाहिए। पहले यह जानना जरूरी है कि बच्चा स्कूल क्यों नहीं आ रहा है, उसके परिवार की आर्थिक स्थिति कैसी है और उसकी शिक्षा में सबसे बड़ी बाधा क्या है।

बच्चों की पहचान से शुरू होनी चाहिए सुधार की पहल

शाला त्यागी बच्चों को दोबारा स्कूल से जोड़ने के लिए सबसे पहले गांवों, बस्तियों और शहरी क्षेत्रों में ऐसे बच्चों की पहचान करनी होगी, जो लंबे समय से स्कूल नहीं जा रहे हैं या बीच में पढ़ाई छोड़ चुके हैं। इसके लिए स्कूलों के शिक्षक, प्रधानपाठक, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, मितानिन, पंचायत प्रतिनिधि और स्थानीय स्वयंसेवी संगठन मिलकर काम कर सकते हैं।


बच्चों की सूची तैयार करने के बाद उनके परिवारों से बातचीत की जानी चाहिए। यह समझना होगा कि बच्चा गरीबी के कारण स्कूल नहीं जा रहा, घर की जिम्मेदारी संभाल रहा है, पढ़ाई में कमजोर होने के कारण पीछे छूट गया है या किसी अन्य समस्या का सामना कर रहा है।


यदि किसी बच्चे के स्कूल नहीं आने का कारण छोटे भाई-बहनों की देखभाल करना है, तो परिवार को ऐसा विकल्प उपलब्ध कराने की दिशा में प्रयास करना होगा, जिससे बच्चे पर यह जिम्मेदारी कम हो सके। यदि समस्या आर्थिक है, तो पात्र परिवारों को उपलब्ध सरकारी योजनाओं से जोड़ने में सहायता की जा सकती है। यदि बच्चा पढ़ाई में कमजोर है, तो उसके लिए अतिरिक्त कक्षाओं और विशेष शैक्षणिक सहयोग की व्यवस्था की जानी चाहिए।

माता-पिता को समझाना होगा कि बच्चों की शिक्षा भी उतनी ही जरूरी है

गरीब परिवारों के माता-पिता अक्सर अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं, लेकिन रोजी-रोटी की मजबूरी के सामने उनकी प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। जब घर चलाने के लिए दोनों माता-पिता को काम पर जाना जरूरी हो, तब बच्चों की देखभाल की समस्या गंभीर हो जाती है।


ऐसी परिस्थितियों में माता-पिता को केवल समझाइश देना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें यह विश्वास दिलाना होगा कि बच्चों की शिक्षा उनके परिवार के भविष्य को बेहतर बना सकती है। इसके लिए स्कूलों में नियमित अभिभावक बैठकें आयोजित की जानी चाहिए। शिक्षकों को अभिभावकों से संवाद कर यह बताना चाहिए कि पढ़ाई छोड़ने से बच्चों के भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।


साथ ही, अभिभावकों की मजबूरियों को भी गंभीरता से सुनना होगा। यदि परिवार को बच्चों की देखभाल के लिए सहयोग की आवश्यकता है, तो स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों और योजनाओं के माध्यम से उचित समाधान तलाशना चाहिए। उद्देश्य परिवार को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि बच्चे की शिक्षा जारी रखने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना होना चाहिए।

स्कूल को बनाना होगा बच्चों के लिए आकर्षक और सहयोगी वातावरण

कई बार बच्चे लंबे समय तक स्कूल से दूर रहने के कारण पढ़ाई में कमजोर हो जाते हैं। कक्षा के दूसरे बच्चों से पिछड़ने पर उन्हें संकोच होने लगता है। कुछ बच्चे शिक्षक या सहपाठियों के सामने अपनी कमजोरी उजागर होने के डर से स्कूल लौटना नहीं चाहते। ऐसे बच्चों को डांटने या उनकी तुलना दूसरे विद्यार्थियों से करने के बजाय अतिरिक्त सहयोग दिया जाना चाहिए।


शिक्षकों को बच्चों की रुचि के अनुसार पढ़ाई को सरल, रोचक और गतिविधि आधारित बनाना चाहिए। खेल, कहानी, चित्र, समूह गतिविधियों और स्थानीय परिवेश से जुड़े उदाहरणों के माध्यम से बच्चों को सीखने के अवसर दिए जा सकते हैं। जो बच्चे लंबे समय तक स्कूल से दूर रहे हैं, उनके लिए विशेष शिक्षण व्यवस्था उपयोगी हो सकती है।


बच्चे जब स्कूल में सम्मान, अपनापन और प्रोत्साहन महसूस करेंगे, तभी उनमें दोबारा पढ़ाई शुरू करने का आत्मविश्वास बढ़ेगा। स्कूल ऐसा स्थान होना चाहिए, जहां बच्चा अपनी पारिवारिक परिस्थितियों के कारण हीनभावना का शिकार न हो, बल्कि उसे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।

समाज की जिम्मेदारी भी कम नहीं

बच्चों को शिक्षा से जोड़ना केवल शासन-प्रशासन या शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। इसके लिए पूरे समाज को आगे आना होगा। ग्राम पंचायत, नगरीय निकाय, सामाजिक संगठन, जनप्रतिनिधि, युवा समूह और जागरूक नागरिक मिलकर शाला त्यागी बच्चों की पहचान करने तथा उन्हें स्कूल लौटाने में सहयोग कर सकते हैं।


स्थानीय स्तर पर ऐसे बच्चों की निगरानी के लिए एक व्यवस्था बनाई जा सकती है, जिसमें स्कूल से लगातार अनुपस्थित रहने वाले बच्चों के परिवारों से समय पर संपर्क किया जाए। समुदाय के सहयोग से बच्चों की देखभाल संबंधी समस्याओं के व्यावहारिक समाधान खोजे जा सकते हैं। जरूरतमंद परिवारों को सरकारी सहायता योजनाओं की जानकारी देकर उन्हें पात्रता के अनुसार लाभ दिलाने में मदद की जा सकती है।


विशेष रूप से उन बस्तियों पर ध्यान देना जरूरी है, जहां बड़ी संख्या में परिवार मजदूरी या असंगठित क्षेत्र के काम पर निर्भर हैं। इन क्षेत्रों में बच्चों की शिक्षा और देखभाल से जुड़ी समस्याओं को समझकर स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार कार्ययोजना तैयार करनी होगी।

योजनाओं की सफलता बच्चों की नियमित उपस्थिति से होगी तय

सरकारी स्कूलों में नाश्ता और दोपहर का भोजन उपलब्ध कराना एक सराहनीय कदम है, लेकिन शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब प्रत्येक बच्चा नियमित रूप से स्कूल पहुंचे, पढ़ाई जारी रखे और अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़े।


इसके लिए केवल नामांकन बढ़ाने के आंकड़ों पर निर्भर रहने के बजाय बच्चों की नियमित उपस्थिति, पढ़ाई में प्रगति और स्कूल छोड़ने के वास्तविक कारणों की समीक्षा की जानी चाहिए। स्कूल छोड़ चुके बच्चों को दोबारा शिक्षा से जोड़ने के बाद भी यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि वे फिर से पढ़ाई न छोड़ें।


आज आवश्यकता इस बात की है कि शासन-प्रशासन बच्चों को स्कूल लाने की रणनीति में उनकी पारिवारिक परिस्थितियों को केंद्र में रखे। गरीबी से जूझ रहे परिवारों के बच्चों के लिए भोजन के साथ शिक्षा, देखभाल और सामाजिक सहयोग का वातावरण तैयार किया जाए।


क्योंकि जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए, उस उम्र में यदि वे अपने छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी उठाने को मजबूर हैं, तो यह केवल उनकी अनुपस्थिति का मामला नहीं, बल्कि समाज के सामने खड़ी एक गंभीर चुनौती है। बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने के लिए केवल भोजन की थाली नहीं, बल्कि उनकी मजबूरियों को समझने वाला संवेदनशील तंत्र भी जरूरी है। जब शासन की योजनाएं, शिक्षकों का प्रयास, अभिभावकों की जागरूकता और समाज का सहयोग एक साथ आगे बढ़ेंगे, तभी शाला त्यागी बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने का सपना साकार हो सकेगा।