धनेश देवांगन बिलासपुर संभाग ब्यूरो चीफ

(कोरबा)सीमित संसाधनों और अभावों के बीच जब इच्छाशक्ति को सही दिशा और आर्थिक संबल मिल जाए, तो सफलता की नई इबारत लिखी जाती है। कोरबा जिले के करतला विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत सरगबुंदिया की सावित्री उरांव ने इसे सच कर दिखाया है। कभी स्थानीय हाट-बाजारों और सड़कों के किनारे कपड़े बेचने वाली सावित्री आज राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के सहयोग से एक सफल और सशक्त महिला उद्यमी के रूप में उभरकर सामने आई हैं।

समूह से जुड़कर बदली दिशा

सावित्री पहले पूंजी के अभाव में बेहद सीमित स्तर पर कपड़ों की फेरी लगाती थीं। पूरे परिवार की सालाना आय महज 60 हजार रुपये के आसपास सिमटी हुई थी, जिससे परिवार का भरण-पोषण बेहद मुश्किल था। जीवन की इस तंगहाली को बदलने के लिए उन्होंने 'जय मां सरस्वती स्व-सहायता समूह' की नींव रखी और अध्यक्ष के रूप में नेतृत्व संभाला। समूह से जुड़ते ही उन्हें वित्तीय प्रबंधन, नियमित बचत और आजीविका संवर्धन के नए अवसरों की जानकारी मिली।

ऋण सहायता से दिया व्यवसाय को विस्तार

राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत समूह को रिवॉल्विंग फंड, सामुदायिक निवेश निधि (CIF) और बैंक लिंकेज का वित्तीय लाभ मिला। सावित्री ने इस वित्तीय तंत्र का सदुपयोग करते हुए व्यक्तिगत ऋण और बैंक लिंकेज के माध्यम से पूंजी जुटाई और अपनी कपड़ा दुकान का विस्तार किया।

सालाना 60 हजार से महीने के 40 हजार रुपये तक का सफर

पूंजी और आत्मविश्वास के मेल ने सावित्री की आजीविका की तस्वीर पूरी तरह बदल दी है:

 * पूर्व स्थिति: कृषि से सालाना मात्र 20 हजार रुपये और पूरे परिवार की कुल सालाना आमदनी लगभग 60 हजार रुपये थी।

 * वर्तमान स्थिति: दुकान के विस्तार के बाद अब वे प्रतिमाह 30 से 40 हजार रुपये की शुद्ध आमदनी अर्जित कर रही हैं।

अन्य महिलाओं के लिए बनीं प्रेरणा

सावित्री उरांव की यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत मुनाफा नहीं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण का जीवंत उदाहरण है। आज वे न केवल अपने परिवार को मजबूत आर्थिक आधार दे चुकी हैं, बल्कि क्षेत्र की अन्य महिलाओं को भी स्व-सहायता समूहों से जुड़कर स्वावलंबी बनने की राह दिखा रही हैं। सामूहिक प्रयास, वित्तीय साक्षरता और समय पर मिले संस्थागत सहयोग ने सावित्री को ग्रामीण अंचल में महिला उन्नति का सशक्त चेहरा बना दिया है।