सदियों का उत्पीड़न, बदलती सामाजिक मानसिकता और शिक्षा के माध्यम से न्यायपूर्ण समाज की चुनौती
धनेश देवांगन बिलासपुर संभाग ब्यूरो चीफ
(कोरबा)इतिहास के पन्नों को पलटने पर एक विचित्र विरोधाभास दिखाई देता है। जिस स्त्री ने सभ्यता को जन्म दिया, परिवार को संस्कार दिए और पीढ़ियों को जीवन का आधार प्रदान किया, उसी स्त्री को सदियों तक अपनी स्वतंत्र पहचान, सम्मान और अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ा। समाज ने स्त्री को कभी देवी का दर्जा दिया, तो कभी उसकी स्वतंत्रता पर पहरे लगाए। कभी उसे शक्ति का प्रतीक माना गया, तो कभी सामाजिक मर्यादाओं और परंपराओं के नाम पर सीमित कर दिया गया। प्रश्न यह है कि जिस समाज ने स्त्री को पूजनीय माना, वह उसकी मानवीय गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा करने में बार-बार असफल क्यों रहा?
इतिहास के आईने में स्त्री की स्थिति
भारतीय इतिहास में स्त्री की स्थिति एकरूप नहीं रही है। वैदिक साहित्य में गार्गी, मैत्रेयी और लोपामुद्रा जैसी विदुषियों का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने ज्ञान, दर्शन और वैचारिक विमर्श में महत्वपूर्ण योगदान दिया। लेकिन विभिन्न ऐतिहासिक कालखंडों में सामाजिक परिस्थितियों और रूढ़िवादी व्यवस्थाओं ने महिलाओं के अवसरों को सीमित किया। बाल विवाह, सती प्रथा, पर्दा प्रथा, दहेज और शिक्षा से वंचित रखने जैसी कुप्रथाएँ स्त्री की स्वतंत्रता के सामने बाधा बनीं।
सावित्रीबाई फुले, पंडिता रमाबाई और अन्य समाज सुधारकों ने महिला शिक्षा एवं सामाजिक अधिकारों के लिए संघर्ष किया। उनके प्रयासों ने भारतीय समाज में नई चेतना का संचार किया। स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी और स्वतंत्र भारत के संविधान द्वारा समानता एवं गरिमा के अधिकारों की स्थापना ने स्त्री की सामाजिक पहचान को नया आधार दिया।
फिर भी इतिहास का एक प्रश्न आज भी अनुत्तरित है—क्या सामाजिक व्यवस्था वास्तव में बदली है, या केवल हिंसा और शोषण के स्वरूप बदले हैं?
आधुनिकता के बीच हिंसा का बदलता चेहरा
आज की स्त्री घर की चारदीवारी से निकलकर शिक्षा, प्रशासन, राजनीति, विज्ञान, चिकित्सा, साहित्य और आर्थिक गतिविधियों में अपनी पहचान बना रही है। वह निर्णय ले रही है, नेतृत्व कर रही है और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रही है। इसके बावजूद घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न, यौन शोषण, मानसिक प्रताड़ना, कार्यस्थल पर भेदभाव और डिजिटल माध्यमों से होने वाला उत्पीड़न समाज के सामने गंभीर चुनौती हैं।
विडंबना यह है कि तकनीक ने मनुष्य को विश्व से जोड़ दिया, लेकिन कई बार मानवीय संवेदनाएँ कमजोर होती दिखाई देती हैं। स्त्री की स्वतंत्रता को लेकर सामाजिक सोच में आज भी विरोधाभास मौजूद है। उससे आधुनिक होने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन उसकी स्वतंत्रता को स्वीकार करने में समाज का एक वर्ग सहज नहीं हो पाता।
हिंसा, मानसिक संघर्ष और आपराधिक प्रवृत्ति का प्रश्न
इस विमर्श का एक महत्वपूर्ण पक्ष आधुनिक समाज में महिलाओं की आपराधिक प्रवृत्ति का विकास भी है। महिलाओं द्वारा किए जाने वाले अपराधों को समझने के लिए उनके सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक और मनोवैज्ञानिक परिवेश का निष्पक्ष अध्ययन आवश्यक है।
निरंतर हिंसा, अपमान, उपेक्षा, आर्थिक निर्भरता और सामाजिक असुरक्षा व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य तथा व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। कुछ परिस्थितियों में आक्रोश, प्रतिशोध की भावना, असुरक्षा और सामाजिक अलगाव जैसी स्थितियाँ भी विकसित हो सकती हैं। हालांकि यह मानना उचित नहीं होगा कि उत्पीड़न का शिकार प्रत्येक महिला अपराध की ओर प्रवृत्त होती है। अपराध के पीछे अनेक जटिल परिस्थितियाँ और व्यक्तिगत निर्णय कार्य करते हैं।
यहाँ समाज के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न है—क्या हम केवल अपराध करने वाले व्यक्ति को दंडित करने तक सीमित रहेंगे, या उन सामाजिक परिस्थितियों का भी अध्ययन करेंगे जो अपराध की जमीन तैयार करती हैं?
स्त्री को केवल पीड़िता अथवा अपराधी के रूप में देखना उसके संपूर्ण व्यक्तित्व को समझने में बाधा बन सकता है। उसके व्यवहार, परिस्थितियों, अधिकारों और सामाजिक परिवेश का संतुलित विश्लेषण आवश्यक है।
शिक्षा: हिंसा और सामाजिक विकृतियों के विरुद्ध सबसे सशक्त माध्यम
इस समस्या के समाधान में शिक्षा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने अथवा रोजगार हासिल करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति में विवेक, आत्मसम्मान, तार्किकता, संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व विकसित करती है।
एक शिक्षित महिला अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती है और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस प्राप्त करती है। लेकिन महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल महिलाओं को शिक्षित करना नहीं है। पुरुषों और महिलाओं दोनों को समानता, सह-अस्तित्व, सम्मान और मानवीय गरिमा का बोध कराना भी आवश्यक है।
विद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों में लैंगिक संवेदनशीलता, नैतिक शिक्षा, संवैधानिक मूल्यों और मानवीय व्यवहार को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए। परिवार को भी ऐसी पहली पाठशाला बनना होगा, जहाँ बेटियों को स्वतंत्रता और बेटों को समानता का संस्कार मिले।
अब प्रश्न समाज की मानसिकता बदलने का है
समाज में वास्तविक परिवर्तन तब आएगा, जब स्त्री की स्वतंत्रता को परिवार के लिए चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक विकास की उपलब्धि माना जाएगा। जब उसकी सफलता को उसके चरित्र से नहीं, उसकी प्रतिभा और परिश्रम से मापा जाएगा। जब घरेलू जिम्मेदारियाँ केवल स्त्री का दायित्व नहीं, बल्कि परिवार की साझा जिम्मेदारी बनेंगी।
कानून अपराध को दंडित कर सकता है, लेकिन संवेदनशील समाज अपराध की संभावनाओं को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके लिए न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आर्थिक अवसर और मानवीय मूल्यों का विकास अनिवार्य है।
सभ्यता का वास्तविक चेहरा स्त्री के सम्मान में दिखाई देता है
इतिहास ने स्त्री के संघर्ष को देखा है, वर्तमान उसकी उपलब्धियों का साक्षी है और भविष्य उसकी समान भागीदारी पर निर्भर करेगा। अब समय आ गया है कि स्त्री के प्रति हिंसा को सामान्य सामाजिक घटना मानने की मानसिकता समाप्त हो। साथ ही महिलाओं द्वारा किए जाने वाले अपराधों को भी पूर्वाग्रह के बिना सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और कानूनी दृष्टि से समझा जाए।
जिस समाज में स्त्री को अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष करना पड़े, वहाँ विकास के दावों पर आत्ममंथन आवश्यक है। स्त्री को देवी बनाकर पूजने से अधिक जरूरी है उसे मनुष्य के रूप में सम्मान देना।
क्योंकि स्त्री की मुक्ति केवल स्त्री का प्रश्न नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज की सभ्यता, संवेदनशीलता और मानवीय चेतना की परीक्षा है।
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