चंद्र कुमार निर्णेजक जिला ब्यूरो चीफ बिलासपुर

(बिलासपुर)मानव जीवन से बढ़कर कोई मूल्य नहीं हो सकता और कानून से ऊपर कोई व्यक्ति अथवा संस्थान नहीं हो सकता। ऐसे में प्रदेश के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद शुक्ला सहित लगभग 27 निर्दोष लोगों की असामयिक मृत्यु तथा सैकड़ों मरीजों के जीवन को गंभीर खतरे में डालने वाले अपोलो अस्पताल के कथित फर्जी डॉक्टर प्रकरण में यदि वास्तविक दोषियों की जवाबदेही तय नहीं होती, तो यह केवल पीड़ित परिवारों के साथ अन्याय नहीं होगा, बल्कि न्याय व्यवस्था एवं कानून के शासन पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न होगा।

इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण और मूल प्रश्न फर्जी डॉक्टर नहीं, बल्कि उसे नियुक्त करने वाला अपोलो अस्पताल प्रबंधन है।

किसी भी अस्पताल की पहली कानूनी एवं नैतिक जिम्मेदारी होती है कि वह अपने यहां नियुक्त किए जाने वाले प्रत्येक चिकित्सक की शैक्षणिक योग्यता, मेडिकल काउंसिल में पंजीयन, अनुभव तथा समस्त दस्तावेजों का पूर्ण सत्यापन करे। यदि इन अनिवार्य प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया और एक कथित फर्जी डॉक्टर वर्षों तक मरीजों का उपचार करता रहा, तो यह केवल एक व्यक्ति का अपराध नहीं माना जा सकता। जिस संस्था ने उसे नियुक्त किया, मरीजों के जीवन का दायित्व सौंपा और वर्षों तक उसे कार्य करने दिया, उसकी जवाबदेही भी समान रूप से निर्धारित होना आवश्यक है।

यही कारण था कि थाना सरकंडा में अपराध क्रमांक 0563/2025, दिनांक 19.04.2025 के अंतर्गत भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 465, 466, 468, 471, 304 एवं 34 के तहत केवल कथित फर्जी डॉक्टर के विरुद्ध ही नहीं, बल्कि अपोलो अस्पताल प्रबंधन के विरुद्ध भी अपराध पंजीबद्ध किया गया। अर्थात स्वयं पुलिस ने प्रथम दृष्टया यह माना कि अस्पताल प्रबंधन की भूमिका की भी आपराधिक विवेचना आवश्यक है।

किन्तु अब यह जानकारी सामने आई है कि विवेचना के दौरान अपोलो अस्पताल प्रबंधन को कथित रूप से क्लीन चिट प्रदान कर दी गई है। यदि ऐसा हुआ है, तो यह निर्णय अनेक गंभीर प्रश्नों को जन्म देता है।

जब स्वयं पुलिस ने उपलब्ध तथ्यों के आधार पर अस्पताल प्रबंधन को आरोपी मानते हुए उसके विरुद्ध एफआईआर दर्ज की, तब विवेचना के दौरान ऐसे कौन-से ठोस एवं निर्णायक साक्ष्य सामने आए, जिनके आधार पर प्रबंधन की संपूर्ण जवाबदेही समाप्त मान ली गई? यदि डॉक्टर की नियुक्ति अपोलो अस्पताल प्रबंधन द्वारा की गई थी, तो उसकी वैधता की जांच का दायित्व किसका था? यदि दस्तावेजों का सत्यापन अस्पताल प्रबंधन की जिम्मेदारी थी, तो उस जिम्मेदारी के निर्वहन में हुई चूक के लिए उत्तरदायित्व किसका है?

यह केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक उत्तरदायित्व का भी प्रश्न है। यदि किसी साधारण नागरिक की लापरवाही से किसी की मृत्यु होती है तो उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई होती है, फिर एक ऐसे संस्थान की जिम्मेदारी कैसे समाप्त हो सकती है, जिसकी लापरवाही का परिणाम अनेक परिवारों के अपूरणीय दुख के रूप में सामने आया?

इस पूरे प्रकरण में कांग्रेस पार्टी ने प्रारंभ से ही पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने तथा दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग को लेकर निरंतर संघर्ष किया है। कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में धरना-प्रदर्शन, ज्ञापन एवं ऐतिहासिक “स्वास्थ्य न्याय यात्रा” आयोजित की गई, जिसमें प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने पैदल मार्च कर पीड़ित परिवारों के न्याय की आवाज़ बुलंद की। उस आंदोलन की मूल भावना यही थी कि केवल कथित फर्जी डॉक्टर ही नहीं, बल्कि जिस अपोलो अस्पताल प्रबंधन ने उसे नियुक्त किया और वर्षों तक मरीजों के उपचार की अनुमति दी, उसकी भूमिका की भी निष्पक्ष जांच कर कानूनी जवाबदेही तय की जाए।

आज यदि अपोलो अस्पताल प्रबंधन को बिना संपूर्ण एवं निष्पक्ष विवेचना के क्लीन चिट प्रदान की जाती है, तो इससे यह संदेश जाएगा कि प्रभावशाली संस्थानों के लिए कानून के मानदंड अलग हैं और सामान्य नागरिकों के लिए अलग। ऐसी स्थिति न्याय के मूल सिद्धांतों और संविधान में निहित समानता की भावना के विपरीत होगी।

अतः आपसे विनम्रतापूर्वक, किंतु दृढ़तापूर्वक निम्नलिखित मांगें की जाती हैं—

1. अपोलो अस्पताल प्रबंधन को दी गई कथित क्लीन चिट का तत्काल पुनर्विचार किया जाए।

2. अपोलो अस्पताल प्रबंधन की भूमिका की किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के नेतृत्व में निष्पक्ष, स्वतंत्र एवं उच्चस्तरीय पुनः विवेचना कराई जाए।

3. कथित फर्जी डॉक्टर की नियुक्ति, उसके दस्तावेजों के सत्यापन, नियुक्ति प्रक्रिया, प्रशासनिक स्वीकृति तथा अस्पताल प्रबंधन की जवाबदेही की विस्तृत जांच कराई जाए।

4. अपराध क्रमांक 0563/2025 में अपोलो अस्पताल प्रबंधन के विरुद्ध दर्ज अपराध की विवेचना को निष्पक्ष एवं प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाया जाए तथा किसी भी दोषी व्यक्ति अथवा संस्था को कानून के दायरे से बाहर न रखा जाए।

5. यदि विवेचना में अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही, कर्तव्य में घोर चूक अथवा किसी प्रकार की आपराधिक संलिप्तता स्थापित होती है, तो उसके विरुद्ध कठोर वैधानिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

6. इस पूरे प्रकरण की विवेचना पूर्ण पारदर्शिता के साथ की जाए, ताकि पीड़ित परिवारों एवं आम जनता का न्याय व्यवस्था पर विश्वास बना रहे।


यह केवल 27 परिवारों का दर्द नहीं है, बल्कि उन लाखों नागरिकों की चिंता का विषय है जो अपने जीवन की सुरक्षा का विश्वास लेकर अस्पतालों में जाते हैं। यदि इतने गंभीर प्रकरण में भी अस्पताल प्रबंधन की जवाबदेही तय नहीं होगी, तो भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना कठिन हो जाएगा।

कानून की सर्वोच्चता, न्याय की निष्पक्षता तथा पीड़ित परिवारों के अधिकारों को सर्वोपरि रखते हुए अपोलो अस्पताल प्रबंधन को दी गई कथित क्लीन चिट का पुनर्विचार कर निष्पक्ष पुनः विवेचना सुनिश्चित करें, ताकि यह संदेश जाए कि भारत में कानून का हाथ हर दोषी तक समान रूप से पहुँचता है।

यदि इस गंभीर प्रकरण में निष्पक्ष एवं संतोषजनक कार्रवाई नहीं की जाती, तो कांग्रेस पार्टी पीड़ित परिवारों एवं आम जनता के साथ लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक तरीके से व्यापक जनआंदोलन करने के लिए बाध्य होगी, जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।


विजय केशरवानी पूर्व जिला कांग्रेस अध्यक्ष, व

पूर्व विधायक प्रत्याशी, बेलतरा विधानसभा 

प्रतिनिधि मंडल में ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष संतोष गर्ग , ब्लॉक अध्यक्ष सरकंडा हितेश देवांगन , दीपक कौशिक , फ़रीद ख़ान , मनोज यादव , अनिमेष रजक , हरीश यादव, आदि उपस्थित थे।