(बस्तर) इंद्रावती शबरी और नारंगी नदियों के रौद्र रूप से बस्तर संभाग में आई सदी की सबसे प्रलयंकारी बाढ़ ने समूचे अंचल को मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया है। 300 से अधिक गांव जलमग्न होने और हजारों आशियाने ध्वस्त होने के हफ्तों बाद भी पीड़ित परिवार टूटी दीवारों के बीच सरकारी इमदाद की बाट जोह रहे हैं। प्रशासनिक सुस्ती के खिलाफ जनआक्रोश के बीच जोहार छत्तीसगढ़ पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष अमित बघेल और छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना के प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. अजय यादव


अपनी टीम सहित ग्राउंड जीरो पर पहुंचे। जलप्रलय से तबाह गांवों का मंजर देखकर नेताओं ने शासन-प्रशासन की संवेदनहीनता पर तीखा प्रहार करते हुए अपनी नाराजगी व्यक्त की।

₹1.20 लाख की सहायता 'ऊंट के मुंह में जीरा', ₹5 लाख मुआवजे की उठाई मांग

प्रभावित बस्तियों का जायजा लेने के बाद अमित बघेल ने राज्य सरकार द्वारा पूर्णतः क्षतिग्रस्त मकानों के लिए घोषित ₹1.20 लाख की राहत राशि को नाकाफ़ी बताया । उन्होंने कहा कि आज के दौर में इस नाममात्र रकम से एक सुरक्षित छत भी खड़ी नहीं की जा सकती।

 सरकार के सामने चार सूत्रीय मांगें:

 मकानों का पुनर्निर्माण:

 पूर्ण रूप से ध्वस्त प्रत्येक मकान के लिए तत्काल ₹5 लाख और आंशिक क्षति पर ₹2 लाख का मुआवजा जारी हो।

 फसल क्षतिपूर्ति:

 डूबी व सड़ी फसलों की भरपाई के लिए किसानों को ₹50 हजार प्रति एकड़ की सीधी आर्थिक मदद मिले।

 राहत शिविरों का विस्तार:

 जब तक हर बेघर परिवार को पक्का आवास नहीं मिल जाता, तब तक राशन, पानी व स्वास्थ्य सुविधाओं से लैस राहत शिविरों का संचालन निर्बाध जारी रहे।

 जनसहयोग का आह्वान:

 उन्होंने प्रदेशवासियों से अपील की कि वे इस मानवीय त्रासदी के समय आगे आकर अपने आपदा पीड़ित बस्तरवासियों की हरसंभव मदद करें।

"विदेशों में खजाना लुटाने वाली सरकारें बस्तर से सौतेला व्यवहार क्यों कर रहीं?": डॉ. अजय यादव

छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना के प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. अजय यादव ने केंद्र व राज्य सरकार की दोहरी नीतियों पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने दो टूक कहा, "जब दुनिया के दूसरे देशों में प्राकृतिक आपदा आती है, तो हमारी सरकारें मदद के लिए खजाना खोल देती हैं। फिर देश के अभिन्न अंग बस्तर, जहां के जल-जंगल-जमीन पर आश्रित आदिवासी और ग्रामीण अपना सब कुछ खो चुके हैं, उनके साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों? 

15 वर्षों की सबसे भयानक तबाही का मंजर:

बंगाल की खाड़ी के मौसमी तंत्र, ओडिशा के ऊपरी बांधों से छोड़े गए भारी पानी और गोदावरी नदी के बैकवाटर के कारण बस्तर संभाग में अभूतपूर्व तबाही मची है:

 * टापू बने 300 से ज्यादा गांव: बस्तर, सुकमा, बीजापुर और दंतेवाड़ा के अंदरूनी इलाके मुख्यधारा से कट गए। बड़े चकवा, तारागांव, मारडूम, करंजी और सुकमा के कोंटा ब्लॉक के दर्जनों गांव दिनों तक जलकैद रहे।

 * रेस्क्यू व राहत का दबाव: NDRF, SDRF और वायुसेना के हेलिकॉप्टरों द्वारा 5,000 से अधिक ग्रामीणों को बचाकर 40 से अधिक राहत शिविरों में पहुंचाया गया, जहां अब भी बुनियादी जरूरतों का भारी अभाव है।

 * आशियाने और मवेशी बहे: सैकड़ों कच्चे मकान जमींदोज हो गए, पक्के घरों में दरारें आ गईं। गृहस्थी का सारा सामान, अनाज और आजीविका का आधार रहे मवेशी तेज बहाव में बह गए।

 * बुनियादी ढांचा ध्वस्त: बिजली के खंभे गिरने और ट्रांसफार्मर डूबने से 100 से अधिक गांवों में ब्लैकआउट पसरा रहा।

*पेयजल स्रोत दूषित होने से संक्रामक रोगों का खतरा गहरा गया है। 

*इंद्रावती का पुराना पुल और दर्जनों रपटे बहने से 40 से अधिक पंचायतों सहित ओडिशा, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से संपर्क बाधित रहा।

 * किसानों की रीढ़ टूटी: 4,000 हेक्टेयर से अधिक रकबे में पकने को तैयार धान की फसल गाद में सड़ गई। 

*साप्ताहिक हाट-बाजार बंद होने से आदिवासियों का वनोपज व्यापार ठप हो गया है, जिससे ग्रामीण पूरी तरह दाने-दाने को मोहताज हैं।

नेताओं ने स्पष्ट कहा कि प्रशासन शीघ्र पारदर्शी सर्वे कराकर पीड़ित परिवारों को सम्मानजनक मुआवजा और विशेष पैकेज की घोषणा करे।